सहारनपुर में मौजूद है शाहजहां के द्वारा बनवाया गया शिकारगाह -

(सहारनपुर) : दुनिया को ताजमहल जैसी नायाब इमारत सौंपने वाले मुगल बादशाह शाहजहां ने अपने प्रेम के पंख सहारनपुर में भी फैलाए थे। सन् 1636 में अलीमरदान खां ने शिवालिक तलहटी में बादशाह शाहजहां के लिए शिकार खेलने के लिए बादशाही महल व बेहद खूबसूरत शिकारगाह बनवाई थी। यमुना के पूर्वी किनारे पर बादशाह महल के नाम से विख्यात इस महल में शिकार करने के दौरान शाहजहां इसी इमारत में आकर आराम फरमाते थे। यदि उन्हें दिल्ली जाना होता था तो वह इसी यमुना के पश्चिमी किनारे से होकर चले जाते थे। इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित करते हुए पुरातत्व विभाग ने इसके आसपास के दो सौ मीटर क्षेत्र को 'विनियमित' श्रेणी में अधिसूचित कर दिया है, इसके बाद भी अवैध कब्जों के कारण यह इमारत अपन बदहाली पर आंसू बहा रही है। इमारत की 200 मीटर की परिधि में भी निर्माण हुए हैं। यमुना किनारे ऊंचाई पर बनी इस इमारत का निर्माण लाखौरी ईटों से किया गया है। बेहद ऊंचाई पर होने के कारण यह स्थल किसी हवामहल से कम नहीं है। इस समय यहां दो कमरे मौजूद हैं। मुख्य इमारत का बचा अवशेष करीब चार हजार वर्ग गज में फैला है। यहां से पूरी यमुना और शिवालिक पहाडि़यों का दिलकश नजारा देखा जा सकता है। इसके बाद भी ऑरकेयोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया इसकी देखभाल नहीं कर रहा है।

राजा गंग की बसाई गंगोह नगरी में किले के कुछ अवशेष आज भी मौजूद है। गौंसगढ़ मुगलकाल के शासकों का केंद्र रहा। लखनौती का इतिहास मुगलकाल की गवाही दे रहा है। सन् 1526 ई. में बाबर यहां आए और यहीं पर इब्राहीम लोदी से उनका युद्ध हुआ तभी लखनौती की नींव पड़ी। यह तुर्कमानों के अधिकार में था यहां 79,694 बीघा में खेती होती थी और 17,96,058 दाम मालगुजारी वसूल होती थी। उसी समय लखनौती को बाबर ने अपने एक सिपहसालार को सौंप दिया था। उसके बाद ही यहां विभिन्न इमारतों का निर्माण हुआ। लखनौती में प्रवेश करते ही मुगल काल का किला आज भी विद्यमान है। मुगल ाल के हुजरे भी यहां कई स्थान पर बने हैं। लखनौती, सरकड़ व शकरपुर मार्ग पर इनके अवशेष आज भी मौजूद हैं। मुगलकाल में बनाई गई भूलभुलैया भी यहां है। इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित स्मारक घोषित करते हुए पुरातत्व विभाग ने इसके आसपास के दो सौ मीटर क्षेत्र को 'विनियमित' श्रेणी में अधिसूचित कर दिया है। इसके बाद यह इमारत खंडहर में तब्दील हो गई है। अधिकतर स्थानों पर अवैध कब्जे हैं। परिसर उपले पाथने के काम आ रहा है तो कही पर पशु भी बंध रहे हैं। गंगोह से दिल्ली तक की सुरंग भी बंद हो गई है। मुगल शिल्प कला का यह अद्भुत नमूना खंडहर बन गया। इसकी सीढि़यों के अवशेष आज भी इसकी कहानी बता रहे हैं। पुरानी इमाम बारगाह भी यहां मौजूद है। 9 साल पहले केन्द्रीय पर्यटन मंत्रालय ने गंगोह को ग्रामीण पर्यटन स्थल का दर्जा दिया इसके बाद भी यहां कुछ नहीं हुआ।

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