मोहबब्त हमारी - Sp Rediwala

 मोहब्ब़त हमारी निलाम हुई कौड़ियों के भाव से 

कभी सोचा ना था कि दर्द भी मिल सकता है लगाव से


वो बात अलग है की अब दिखाते नहीं है हम

वरना खून तो आज भी टपकता है उसके दिए घाव से


एक वक्त था की उसकी गलीयों मै रोज जाते थे हम 

एक वक्त है की हम गुजरते भी नहींं है उसके गांव से


एक दरिया जो हमसे ना हुआ पार कई सालो मैं 

और एक वो की हाथ छोड पार कर गया गैरो की नाव से


वो जब तक साथ था हम कदमों में फूल बीछाते रहे

वो कमबख़्त एक कांटा ना निकाल सका हमारे पाँव से


मुझे मालूम था कि मैं ठोकर खाकर ही संभल लूंगा

इसलिए कभी पत्थर हटाया ही नहीं मैंने राहों से


- Sp Rediwala

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